सारंडा जंगल की आख़िरी परछाईं – Part 2
भूमिका (Recap & Introduction)
सारंडा जंगल की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी। राघव वर्मा ने जब सोनम की सच्चाई दुनिया के सामने रखी, तब लोगों को लगा कि आख़िरी परछाईं अब मुक्त हो चुकी है। जंगल में अजीब आवाज़ें बंद हो गईं, गांव में शांति लौट आई।
लेकिन कुछ सच्चाइयाँ सिर्फ़ उजागर होकर खत्म नहीं होतीं… वे अपनी आख़िरी कीमत मांगती हैं।
यह कहानी उसी कीमत की है।
अध्याय 1: लेख के बाद की रातें
लेख छपने के बाद राघव दिल्ली लौट आया। उसकी रिपोर्ट वायरल हो चुकी थी। टीवी चैनल इंटरव्यू के लिए बुला रहे थे। लोग उसे बहादुर पत्रकार कह रहे थे।
लेकिन हर रात ठीक 2:13 बजे राघव की नींद टूट जाती। कमरे की दीवार पर एक परछाईं उभर आती—धीरे-धीरे लंबी होती हुई।
वो परछाईं बोलती नहीं थी, बस देखती थी।
अध्याय 2: अधूरी रिकॉर्डिंग
एक रात राघव ने अपना पुराना रिकॉर्डर चलाया। आख़िरी फाइल अपने आप प्ले हो गई—एक ऐसी रिकॉर्डिंग जो उसने कभी सुनी ही नहीं थी।
"सच एक नहीं होता, राघव…"
आवाज़ सोनम की थी। लेकिन इस बार उसमें दर्द से ज़्यादा चेतावनी थी।
अध्याय 3: दूसरा नाम
अगले दिन राघव ने अपने नोट्स दोबारा पढ़े। सोनम के केस में एक नाम बार-बार काटा गया था—देवड़ा हांसदा। गांव का पुराना ठेकेदार।
उसी के कहने पर सोनम को दोषी ठहराया गया था। लेकिन ये सच लेख में नहीं छप पाया था।
शायद यही अधूरापन था।
अध्याय 4: वापसी का बुलावा
राघव के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया:
"जंगल अब भी जाग रहा है।"
लोकेशन—सारंडा।
राघव समझ गया—ये कोई इत्तेफाक नहीं था।
अध्याय 5: बदला हुआ गांव
हातु गांव पहले जैसा नहीं था। कई घर बंद थे। लोग नजरें चुराकर बात कर रहे थे। लाखन मांझी अब भी वहीं था, लेकिन उसकी आवाज़ कांप रही थी।
"परछाईं वापस आ गई है," उसने कहा।
अध्याय 6: जंगल की गहराई
इस बार जंगल और भी शांत था। जैसे हर पेड़ कुछ छुपा रहा हो। राघव ने देखा—कई परछाइयाँ थीं। सब अलग-अलग, लेकिन चेहरा एक ही।
"हम सब वही हैं," आवाज़ आई।
अध्याय 7: असली अपराध
जंगल के बीच एक पुराना गड्ढा था। वहीं सोनम को छोड़ा गया था। लेकिन सच्चाई और भी भयानक थी—देवड़ा ने जंगल की ज़मीन हड़पने के लिए झूठा इल्ज़ाम रचाया था।
सोनम सिर्फ़ पहली शिकार थी।
अध्याय 8: सामना
देवड़ा हांसदा अब बूढ़ा हो चुका था। जब उसे जंगल लाया गया, परछाइयों ने उसे घेर लिया।
"हम बदला नहीं चाहते… स्वीकारोक्ति चाहते हैं," आवाज़ें गूंज उठीं।
देवड़ा टूट गया। उसने सब स्वीकार कर लिया।
अध्याय 9: आख़िरी बलिदान
परछाइयों ने राघव की ओर देखा।
"सच लाने वाले को कीमत चुकानी पड़ती है।"
राघव को महसूस हुआ—अगर वह यहां रहा, तो शायद वह कभी लौट न पाए। लेकिन अगर गया, तो परछाइयाँ कभी शांत नहीं होंगी।
उसने कैमरा ऑन किया… और खुद जंगल में रुक गया।
अध्याय 10: अगली सुबह
सुबह गांव वालों ने जंगल के किनारे राघव का कैमरा पाया। रिकॉर्डिंग लाइव थी।
सारी सच्चाई दुनिया के सामने थी।
राघव कभी वापस नहीं आया।
निष्कर्ष (Conclusion)
आज भी सारंडा जंगल में जब सूरज ढलता है, एक नई परछाईं उभरती है—कैमरा उठाए हुए।
लोग कहते हैं—अब वो परछाईं सच की रखवाली करती है।
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Disclaimer: यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। किसी भी वास्तविक व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है।
