सारंडा जंगल की आख़िरी परछाईं | Hindi Horror Story | Part 1

 

सारंडा जंगल की आख़िरी परछाईं





भूमिका (Introduction)

झारखंड का सारंडा जंगल—दिन में हरे-भरे साल के पेड़ों से ढका, पक्षियों की आवाज़ों से भरा, और आदिवासी जीवन की सादगी से चमकता हुआ। लेकिन सूरज ढलते ही यही जंगल अपनी दूसरी शक्ल दिखाता है। यहाँ की हवा में एक अजीब-सी ठंडक घुल जाती है, जैसे कोई अदृश्य परछाईं पेड़ों के बीच घूमने लगती हो। स्थानीय लोग कहते हैं—"जो सारंडा को समझे बिना रात में भीतर गया, वो वापस वैसा नहीं लौटा।"

यह कहानी उसी जंगल की है—एक ऐसी परछाईं की, जो न पूरी तरह ज़िंदा है, न मरी हुई… और जो हर उस इंसान को पुकारती है, जो सच की तलाश में बहुत आगे निकल जाता है।


अध्याय 1: रिपोर्टर की एंट्री

राघव वर्मा, रांची का एक स्वतंत्र पत्रकार, रहस्यमयी जगहों पर रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता था। उसे अफ़वाहों पर भरोसा नहीं था—वो सिर्फ़ सबूत मानता था। जब उसे सारंडा जंगल में होने वाली अजीब घटनाओं की ख़बर मिली, तो उसने तुरंत एक लंबा आर्टिकल लिखने का मन बना लिया।

गांव वालों के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में जंगल के किनारे बसे गांव से तीन लोग गायब हो चुके थे। न कोई लाश मिली, न कोई सुराग। बस रात के समय जंगल से आती थीं—धीमी-धीमी आवाज़ें, जैसे कोई नाम लेकर पुकार रहा हो।

राघव ने कैमरा, रिकॉर्डर और नोटबुक उठाई और सारंडा के लिए निकल पड़ा।


अध्याय 2: गांव की चेतावनी

जंगल के पास बसे गांव "हातु" में पहुंचते ही राघव को एक अजीब सन्नाटा महसूस हुआ। दिन होने के बावजूद लोग घरों के बाहर कम दिख रहे थे। एक बुज़ुर्ग—लाखन मांझी—ने राघव को देखते ही कहा,

"बाबू, लिखना है तो लिखो… पर रात रुकना मत।"

राघव मुस्कराया, "डर की कहानियों से ही तो सच निकलता है।"

लाखन मांझी का चेहरा गंभीर हो गया। "ये डर की कहानी नहीं है। ये जंगल की आख़िरी परछाईं है।"

राघव ने पूछा, "आख़िरी परछाईं?"

"जो इंसान की परछाईं बनकर उसे जंगल के भीतर ले जाती है।"


अध्याय 3: पहली आवाज़

शाम ढलते ही राघव ने अपना टेंट जंगल के किनारे लगाया। कैमरा ऑन था, रिकॉर्डर भी। रात करीब 11 बजे अचानक रिकॉर्डर में हल्की-सी फुसफुसाहट कैद हुई।

"राघव…"

उसने चौंककर चारों ओर देखा। आसपास कोई नहीं था। हवा भी थमी हुई थी। फिर आवाज़ आई—इस बार और साफ़।

"सच जानना है… तो भीतर आओ…"

राघव का दिल तेज़ धड़कने लगा, लेकिन पत्रकार का जज़्बा डर से बड़ा था।


अध्याय 4: जंगल के भीतर

जैसे-जैसे राघव जंगल के अंदर बढ़ता गया, मोबाइल सिग्नल गायब हो गया। पेड़ इतने घने थे कि चांदनी भी ज़मीन तक नहीं पहुंच पा रही थी। तभी उसने देखा—एक परछाईं, बिल्कुल उसकी जैसी।

वो परछाईं आगे बढ़ी… और राघव अनजाने में उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।


अध्याय 5: बीते समय की कहानी

अचानक जंगल का दृश्य बदला। राघव ने खुद को 30 साल पीछे पाया। सामने एक छोटी आदिवासी बस्ती थी। गांव के बीचोंबीच एक औरत—सोनम—रो रही थी।

गांव वालों ने उस पर जंगल में गुमशुदगी का आरोप लगाया था। बिना सबूत, बिना सुने—उसे जंगल में छोड़ दिया गया।

उस रात सोनम जंगल में खो गई। और तभी जन्म हुआ—आख़िरी परछाईं का।


अध्याय 6: सच्चाई का बोझ

परछाईं ने राघव से कहा,

"मैं बदला नहीं चाहती… मैं सच चाहती हूं।"

राघव समझ गया—यह आत्मा नहीं, अधूरा सच है। जो हर बार किसी को बुलाता है ताकि कहानी पूरी हो सके।


अध्याय 7: वापसी या क़ैद

सुबह होते ही राघव खुद को जंगल के बाहर पाया। कैमरा चालू था, रिकॉर्डर में पूरी कहानी कैद थी। लेकिन गांव पहुंचते ही उसने देखा—लाखन मांझी की आंखों में डर था।

"तुम वापस आ गए… ये पहली बार है।"

राघव ने लेख लिखा। सच छापा। सोनम की कहानी सामने आई।


अध्याय 8: आख़िरी परछाईं का अंत?

लेख छपने के बाद जंगल से आवाज़ें आनी बंद हो गईं। लोग बोले—परछाईं मुक्त हो गई।

लेकिन कुछ रातों में, जब हवा बहुत शांत होती है, राघव को आज भी अपनी खिड़की के पास एक परछाईं दिखती है… जो मुस्कुराती है।


निष्कर्ष (Conclusion)

सारंडा जंगल आज भी वहीं है—शांत, गहरा और रहस्यमय। सवाल सिर्फ़ इतना है—क्या हर परछाईं भूत होती है? या कुछ परछाइयां हमारी ही बनाई हुई सच्चाइयों का बोझ होती हैं?

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Disclaimer: यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और किसी वास्तविक घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है।

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