काली पहाड़ी का आख़िरी रास्ता
भूमिका (Introduction)
हर शहर के बाहर एक ऐसी जगह होती है, जिसके बारे में लोग दिन में हँसते हैं और रात में बात करने से कतराते हैं। काली पहाड़ी भी उन्हीं जगहों में से एक थी। एक सुनसान पहाड़ी, जिसके ऊपर जाने वाला रास्ता वर्षों से बंद पड़ा था।
लोग कहते थे—जो उस रास्ते से ऊपर गया, वो या तो लौटा नहीं… या लौटा तो पहले जैसा नहीं रहा।
यह कहानी उसी रास्ते की है।
अध्याय 1: ट्रांसफर
आदित्य मल्होत्रा को पहाड़ी कस्बे धौलपुरा में पोस्टिंग मिली थी। शहर की भीड़ से दूर, शांत जगह—यही सोचकर वह खुश था।
लेकिन टैक्सी ड्राइवर ने जैसे ही उसका सामान उतारा, उसने एक सवाल किया—
"सर, काली पहाड़ी वाले रास्ते से तो नहीं जाना पड़ेगा न?"
आदित्य ने हँसते हुए कहा, "डरते हो क्या?"
ड्राइवर ने जवाब नहीं दिया। बस पहाड़ी की ओर देखकर चुप हो गया।
अध्याय 2: बंद रास्ता
आदित्य का सरकारी क्वार्टर काली पहाड़ी के ठीक नीचे था। सामने एक टूटी हुई सड़क ऊपर की ओर जाती दिखती थी। बोर्ड लगा था—
"यह रास्ता सूर्यास्त के बाद बंद है"
लेकिन बोर्ड पुराना था। जंग लगा हुआ। जैसे किसी ने जानबूझकर समय को वहीं रोक दिया हो।
अध्याय 3: पहली रात
पहली ही रात आदित्य को नींद नहीं आई। आधी रात को खिड़की के बाहर से कदमों की आवाज़ आई।
उसने झाँककर देखा—पहाड़ी वाले रास्ते पर कोई चल रहा था।
लेकिन वहां तो कोई रहता ही नहीं था।
अध्याय 4: पुराना चौकीदार
अगले दिन आदित्य की मुलाकात रामसहाय से हुई—पहाड़ी के नीचे बने पुराने गेस्ट हाउस का चौकीदार।
रामसहाय ने साफ़ शब्दों में कहा—
"बाबू, ऊपर मत जाना। रास्ता सिर्फ़ पत्थरों का नहीं है।"
"तो किसका है?" आदित्य ने पूछा।
"यादों का।"
अध्याय 5: बीती घटना
रामसहाय ने बताया—बीस साल पहले पहाड़ी पर एक छोटा सा अस्पताल था। रात में एक हादसा हुआ। बिजली चली गई। मदद नहीं पहुंची।
सुबह अस्पताल खाली था। न मरीज, न डॉक्टर।
और तभी रास्ता बंद कर दिया गया।
अध्याय 6: बुलावा
उस रात आदित्य के मोबाइल पर बिना नेटवर्क के एक मैसेज आया—
"रास्ता अब खुला है।"
मैसेज के साथ लोकेशन थी—काली पहाड़ी।
अध्याय 7: चढ़ाई
आदित्य ने टॉर्च ली और पहाड़ी की ओर बढ़ा। रास्ता जितना ऊपर जाता, उतना ही ठंडा होता जाता।
चारों तरफ़ एक अजीब सन्नाटा था।
फिर उसने देखा—रास्ते पर जले हुए स्ट्रेचर, टूटी हुई दवाइयाँ, और दीवारों पर हाथों के निशान।
अध्याय 8: अस्पताल
पहाड़ी के ऊपर अस्पताल अब भी खड़ा था। दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर घुसते ही उसे वही कदमों की आवाज़ फिर सुनाई दी।
"डॉक्टर साहब…" किसी ने पुकारा।
आदित्य का नाम नहीं लिया गया। फिर भी आवाज़ उसी के लिए थी।
अध्याय 9: सच्चाई
आदित्य को पता चला—उस रात अस्पताल में मौजूद लोगों को बचाया जा सकता था। लेकिन फ़ाइलें दबा दी गईं। रास्ता बंद कर दिया गया।
लोग नहीं मरे थे—उन्हें भुला दिया गया था।
अध्याय 10: सुबह
सुबह गांव वालों ने देखा—पहाड़ी का रास्ता साफ़ था। बोर्ड गायब था।
आदित्य अपने क्वार्टर में नहीं मिला।
लेकिन अस्पताल के रजिस्टर में एक नया नाम दर्ज था—
डॉ. आदित्य मल्होत्रा
निष्कर्ष (Conclusion)
आज भी काली पहाड़ी का रास्ता दिन में खुला रहता है।
रात होते ही अपने आप बंद हो जाता है।
कहते हैं—अब कोई डॉक्टर ऊपर मौजूद है।
जो उन लोगों का इंतज़ार करता है… जिन्हें कभी रास्ता नहीं मिला।
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Disclaimer: यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। किसी वास्तविक स्थान या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है।
