झूमके वाली रात
लेखक: सिद्धार्थ कुमार शर्मा
वेबसाइट: मैं voiceofmemories.in
भूमिका
कुछ चीज़ें रास्ते में गिरी नहीं होतीं…
उन्हें जानबूझकर छोड़ा जाता है।
कहानी
राहुल एक नौजवान लड़का था। उम्र मुश्किल से पच्चीस साल। शहर के बाहर एक निजी फैक्ट्री में नाइट ड्यूटी करता था। रोज़ की तरह उस रात भी वह अपनी साइकिल से घर लौट रहा था। समय था करीब 12:40 बजे। सड़क सुनसान थी, चारों तरफ़ सन्नाटा और बीच-बीच में जलते–बुझते स्ट्रीट लाइट।
उसी सड़क मोड़ पर, जहाँ अक्सर लोग तेज़ चलने से भी कतराते थे, राहुल की नज़र ज़मीन पर पड़ी।
एक झूमका।
चमकदार, पुराना, लेकिन अजीब तरह से साफ़। जैसे अभी-अभी किसी ने रखा हो। उसके चारों ओर काँटे और झाड़ियाँ थीं, मगर झूमके पर एक भी खरोंच नहीं।
राहुल रुका।
मन ने कहा—मत उठाना।
लेकिन हाथ अपने आप बढ़ गया।
जैसे ही उसने झूमका उठाया, उसके कानों में हल्की सी आवाज़ गूँजी—
“मिल गया…”
राहुल चौंक गया। उसने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। उसने झूमका जेब में डाला और तेज़ी से घर की ओर बढ़ गया।
पहली रात
घर पहुँचते ही राहुल ने हाथ-मुँह धोया और बिस्तर पर गिर गया। थकान बहुत थी। मगर नींद… नींद नहीं आई।
रात के 3:03 बजे, उसके कान में फिर वही आवाज़ आई—
“मेरा झूमका…”
राहुल की आँखें खुल गईं। कमरे में अँधेरा था, लेकिन आईने में कुछ चमक रहा था।
वही झूमका।
आईने के सामने हवा में लटका हुआ।
अचानक आईने में एक और परछाईं दिखी—लंबे खुले बाल, झुका हुआ सिर, और कान से बहता हुआ खून।
राहुल चीख़ भी नहीं पाया।
झूमका ज़मीन पर गिरा। और सब कुछ सामान्य हो गया।
बदलती चीज़ें
अगले दिन से राहुल बदलने लगा।
वह लोगों की बातें दोहराने लगा, बिना सुने जवाब देने लगा। कई बार वह किसी खाली कोने में देखकर मुस्कुरा देता। फैक्ट्री में मशीनें बंद होने लगीं, और हर बार CCTV में एक ही चीज़ दिखती—
राहुल के पीछे खड़ी एक औरत…
जिसके दोनों कानों में सिर्फ़ एक झूमका था।
सच्चाई
राहुल ने झूमके के बारे में खोज शुरू की। पुराने रिकॉर्ड्स खंगाले। तब पता चला—
दस साल पहले उसी सड़क पर एक लड़की की हत्या हुई थी। उसके कानों से झूमके नोच लिए गए थे। मरते वक़्त उसने बस इतना कहा था—
“जो मेरा झूमका उठाएगा… मैं उसके साथ जाऊँगी।”
लोग कहते थे, उसका एक झूमका आज भी रास्ते में पड़ा मिलता है।
लेकिन जो उठाता है…
वह फिर कभी अकेला नहीं रहता।
आख़िरी रात
उस रात राहुल ने झूमका वापस उसी जगह रखने का फैसला किया। आधी रात, वही सड़क, वही सन्नाटा।
जैसे ही उसने झूमका ज़मीन पर रखा—
पीछे से दो ठंडे हाथ उसके कंधे पर पड़े।
“अब देर हो गई…”
राहुल ने पलटकर देखा।
वह औरत मुस्कुरा रही थी।
और इस बार…
उसके दोनों कानों में झूमके थे।
अंत
अगली सुबह सड़क किनारे राहुल की साइकिल मिली।
झूमका… गायब था।
लेकिन आज भी लोग कहते हैं—
अगर रात में उस रास्ते से गुज़रो,
और ज़मीन पर कोई चमकती चीज़ दिखे,
तो झुकना मत।
क्योंकि कुछ चीज़ें उठाने के बाद…
ज़िंदगी फिर पहले जैसी नहीं रहती।
महत्वपूर्ण सूचना (Terms & Conditions)
यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसका उद्देश्य केवल मनोरंजन और रचनात्मक अभिव्यक्ति है। इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, समुदाय, धर्म, जाति, स्थान या घटना से कोई संबंध नहीं है। यह कहानी किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने, डर फैलाने या किसी प्रकार की नकारात्मक भावना को बढ़ावा देने के लिए नहीं लिखी गई है। यदि किसी को यह कहानी काल्पनिक होते हुए भी असहज लगे, तो वह पूरी तरह संयोग मात्र है।
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लेखक: सिद्धार्थ कुमार शर्मा
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