लोहरदग्गा हॉस्टल का साया
( एक सच्ची घटना पर आधारित डरावनी कहानी )
लेखक: सिद्धार्थ कुमार शर्मा
वेबसाइट: Voice of Memories.in
भूमिका
झारखंड के जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसा लोहरदग्गा बाहर से जितना शांत दिखता है, अंदर उतना ही रहस्यमयी है। यहाँ के पुराने स्कूल हॉस्टल की एक कहानी वर्षों से लोगों के बीच फुसफुसाहट बनकर घूमती रही है।
कहा जाता है कि उस हॉस्टल में एक भयानक भूत रहता था, जो रात के समय बच्चों को डराया करता था। कई बच्चों ने उसे देखा, कई बीमार पड़े, और कुछ तो हमेशा के लिए हॉस्टल छोड़कर चले गए।
यह कहानी सिर्फ कल्पना नहीं…
यह उन बच्चों की यादों से निकली है, जो आज भी नींद में चौंककर उठ जाते हैं।
लोहरदग्गा का वह पुराना हॉस्टल
लोहरदग्गा शहर से लगभग दो किलोमीटर दूर, सालों पुराना एक सरकारी बालक हॉस्टल था।
चारों तरफ घने पेड़, पीछे एक सूखा तालाब और सामने टूटी-फूटी बाउंड्री।
दिन में सब सामान्य लगता था, लेकिन रात होते ही वातावरण बदल जाता।
हॉस्टल की तीसरी मंज़िल—
जहाँ ज्यादातर कमरे खाली रहते थे—
वहीं से डर की शुरुआत होती थी।
पहली रात का डर
साल 2009 की बात है।
नए सत्र में करीब 40 बच्चे हॉस्टल में आए।
रात के करीब 12:30 बजे—
अचानक किसी बच्चे की चीख सुनाई दी।
“भूत…! कोई है…!”
वार्डन दौड़कर आया, लेकिन कमरे में कुछ नहीं था।
बस खिड़की खुली थी… और कमरे का तापमान असामान्य रूप से ठंडा।
भूत की पहली झलक
अगली रात, पाँच बच्चों ने एक ही बात कही—
उन्होंने एक काले साये को देखा था।
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लंबा शरीर
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उलटे मुड़े पैर
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और आँखों की जगह जलती हुई लाल रोशनी
वह साया कभी छत पर चलता,
कभी खिड़की से झांकता,
और कभी बच्चों के कान में फुसफुसाता—
“यह जगह मेरी है…”
बच्चों का बीमार पड़ना
कुछ ही दिनों में अजीब घटनाएँ होने लगीं—
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बच्चे बिना कारण बुखार में रहने लगे
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रात को चीखकर उठना
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शरीर पर नीले-काले निशान
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और बार-बार एक ही सपना
सपने में वही हॉस्टल…
वही तीसरी मंज़िल…
और एक आवाज—
“भागो मत… तुम यहीं रहोगे…”
हॉस्टल का काला इतिहास
एक बुज़ुर्ग चौकीदार ने आखिर सच्चाई बताई।
करीब 20 साल पहले, उसी हॉस्टल में एक छात्र ने आत्महत्या कर ली थी।
उस पर चोरी का झूठा आरोप लगाया गया था।
मरने से पहले उसने कहा था—
“मैं निर्दोष हूँ… और मैं वापस आऊँगा…”
लोगों का मानना था कि उसी की आत्मा आज भी भटक रही है।
भयानक रात – जब भूत सामने आया
एक रात बिजली चली गई।
पूरा हॉस्टल अंधेरे में डूब गया।
अचानक—
तीसरी मंज़िल से ज़ोर-ज़ोर से हँसने की आवाज़ आने लगी।
सभी बच्चों ने एक साथ देखा—
सीढ़ियों पर खड़ा था वह भूत।
उसका चेहरा जला हुआ,
आँखें खाली,
और आवाज़ जैसे गले से नहीं, दीवारों से आ रही हो।
“तुम सब मेरी तरह अकेले हो जाओगे…”
तांत्रिक का बुलाया जाना
डरे हुए वार्डन ने एक तांत्रिक को बुलाया।
तांत्रिक ने कहा—
“यह आत्मा बहुत शक्तिशाली है।
यह बच्चों के डर से ज़िंदा रहती है।”
पूरी रात पूजा चली।
मंत्र गूंजते रहे।
सुबह 4 बजे—
एक तेज़ चीख आई…
और फिर… सन्नाटा।
हॉस्टल का बंद होना
उस घटना के बाद—
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हॉस्टल को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया
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तीसरी मंज़िल सील कर दी गई
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बच्चे दूसरे शहर भेज दिए गए
आज भी वह इमारत खड़ी है…
टूटी खिड़कियों के साथ।
आज की सच्चाई
स्थानीय लोग कहते हैं—
आज भी अमावस्या की रात
उस हॉस्टल से—
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बच्चों की हँसी
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रोने की आवाज़
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और सीढ़ियों पर चलने की आहट
सुनाई देती है।
कोई वहाँ रात में रुकने की हिम्मत नहीं करता।
क्या भूत आज भी है?
यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।
लेकिन जो वहाँ गया…
वह बदलकर लौटा।
कुछ कहानियाँ सिर्फ कहानी नहीं होतीं—
वे यादें होती हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
लोहरदग्गा हॉस्टल का भूत सिर्फ एक डरावनी कहानी नहीं, बल्कि उन बच्चों की दबी हुई यादें हैं, जिन्होंने डर को बहुत करीब से देखा।
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और हर याद का एक साया।

