क्वार्टर नंबर 17 का छलावा
(एक ऐसा भूत जो किसी का भी रूप ले सकता था)
लेखक: सिद्धार्थ कुमार शर्मा
वेबसाइट: Voice of Memories.in
भूमिका
कुछ भूत दिखते नहीं…
वे हमारे अपने चेहरे पहन लेते हैं।
कुछ आत्माएँ चिल्लाती नहीं…
वे प्यार से बुलाती हैं।
और सबसे खतरनाक वही होते हैं
जो आपके सामने
आपके माँ-बाप,
आपकी पत्नी,
या आपके बच्चे का रूप लेकर खड़े हो जाते हैं।
यह कहानी है
क्वार्टर नंबर 17 की—
जहाँ एक परिवार को
ऐसे छलावा वाले भूत ने डराया,
कि अंत में
माता-पिता की मौत हो गई।
वह सरकारी क्वार्टर
पुराने सरकारी क्वार्टर,
जंगल से सटे हुए,
ज्यादातर खाली।
क्वार्टर नंबर 17
सबसे आख़िरी में था।
लोग कहते थे—
“वहाँ कोई टिकता नहीं…
जो रहता है, टूट जाता है।”
लेकिन रमेश को नौकरी के साथ
यही क्वार्टर मिला।
परिवार का आना
रमेश, उसकी पत्नी सीमा,
और उनका 8 साल का बेटा अंकित।
पहली कुछ रातें सामान्य थीं।
लेकिन पाँचवीं रात—
सीमा ने कहा—
“आप रात में उठकर
अंकित से बात क्यों कर रहे थे?”
रमेश चौंक गया—
“मैं तो उठा ही नहीं…”
पहली छलावा वाली घटना
उसी रात—
अंकित रोता हुआ उठा।
“मम्मी…
पापा बाहर खड़े हैं
और मुझे बुला रहे हैं…”
रमेश उस वक्त
सीमा के पास ही सो रहा था।
जब उन्होंने दरवाज़ा खोला—
कोई नहीं था।
लेकिन बाहर
पैरों के निशान थे
जो दीवार पर जाकर
अचानक गायब हो जाते थे।
भूत ने रूप बदलना शुरू किया
अब चीज़ें और डरावनी होने लगीं।
-
कभी सीमा को लगता
उसकी सास कमरे में बैठी है -
कभी रमेश को
अपने मरे हुए पिता की आवाज़ सुनाई देती -
कभी अंकित कहता—
“दादू रोज़ रात में
मुझे कहानी सुनाने आते हैं…”
सबसे डरावनी बात?
हर वो इंसान
असल में मर चुका था।
आईने के सामने सच्चाई
एक रात सीमा
बाथरूम में थी।
आईने में उसने देखा—
उसके पीछे
वही खड़ी है…
वह खुद।
लेकिन उस चेहरे की
मुस्कान गलत थी।
पीछे से आवाज़ आई—
“मैं तुमसे पहले
यहाँ आ गई थी…”
सीमा बेहोश हो गई।
क्वार्टर का काला इतिहास
पड़ोसी बूढ़े चौकीदार ने बताया—
20 साल पहले
इसी क्वार्टर में
एक परिवार ने
सामूहिक आत्महत्या की थी।
पिता ने पहले
पत्नी और बच्चे को मारा,
फिर खुद मर गया।
मरने से पहले
उसने कहा था—
“अब यह घर
किसी का नहीं होगा…”
माता-पिता की मानसिक टूटन
छलावा भूत
अब और चालाक हो गया।
वह—
-
रमेश के रूप में
सीमा से झगड़ता -
सीमा के रूप में
रमेश को डराता -
अंकित के रूप में
माता-पिता को दोष देता
घर में हर समय
लड़ाई, चीख, डर।
एक रात
सीमा ने कहा—
“आप मर चुके हैं…
आप मुझे क्यों परेशान कर रहे हैं?”
अगली सुबह—
सीमा फाँसी पर लटकी मिली।
पिता की आख़िरी रात
सीमा की मौत के बाद
रमेश टूट चुका था।
रात को उसने देखा—
सीमा सामने खड़ी है।
मुस्कुराकर बोली—
“चलो…
अब साथ चलने का वक्त आ गया है…”
अगली सुबह
रमेश का शव
बिस्तर पर मिला।
आँखें खुली थीं।
चेहरे पर
भय की स्थायी छाप।
बच्चा जो सच जानता था
अंकित को
सरकारी बालगृह भेज दिया गया।
लेकिन वहाँ वह बार-बार कहता—
“वो भूत
मेरी मम्मी-पापा नहीं था…
वो बस उनका चेहरा पहनता था…”
कुछ महीनों बाद
अंकित ने बोलना बंद कर दिया।
आज का हाल
क्वार्टर नंबर 17
आज भी खाली है।
लोग कहते हैं—
-
कभी माँ की आवाज़ आती है
-
कभी पापा की हँसी
-
कभी बच्चे का रोना
लेकिन जो अंदर जाता है
वह एक ही बात कहता है—
“वहाँ कोई
आपका चेहरा पहनकर
आपको देख रहा होता है…”
निष्कर्ष
छलावा वाला भूत
मारता नहीं—
वह आपको आपसे लड़वाता है।
वह तब तक नहीं छोड़ता
जब तक
आप अंदर से मर न जाएँ।
और क्वार्टर नंबर 17
आज भी
किसी नए चेहरे का इंतज़ार कर रहा है…


