क्वार्टर नंबर 17 : छलावे की वापसी
(Part 2 – जब अंकित लौटकर आया)
लेखक: सिद्धार्थ कुमार शर्मा
वेबसाइट: Voice of Memories.in
शुरुआत – 15 साल बाद
अंकित अब 23 साल का था।
बालगृह छोड़ने के बाद उसने पढ़ाई पूरी की, नौकरी मिली…
लेकिन एक चीज़ कभी नहीं बदली—
नींद।
हर रात उसे वही सपना आता—
एक घर…
क्वार्टर नंबर 17…
और उसकी माँ की आवाज़—
“अंकित… दरवाज़ा खोलो…”
डॉक्टरों ने कहा—
यह ट्रॉमा है।
लेकिन अंकित जानता था—
यह याद नहीं…
निमंत्रण है।
वापसी का फैसला
एक दिन दफ़्तर से लौटते वक्त
अचानक उसका रास्ता
उसी कॉलोनी से होकर गया।
वही जंग लगे गेट,
वही टूटी सड़क…
और दूर से दिखता
क्वार्टर नंबर 17।
उसके फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
एक मैसेज आया—
Unknown Number
“इतनी देर लगा दी…
घर आने में?”
अंकित के हाथ काँपने लगे।
क्वार्टर के अंदर
दरवाज़ा अब भी बंद था।
लेकिन जैसे ही अंकित ने हाथ लगाया—
चर्ररर…
दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर
सब कुछ वैसा ही था
जैसा बचपन में—
-
वही सोफ़ा
-
वही दीवार की दरार
-
वही आईना
लेकिन हवा में
एक जानी-पहचानी बदबू थी—
मौत की।
आईना फिर से बोला
अंकित बाथरूम के पास पहुँचा।
आईना धुंधला था।
फिर उसमें
तीन परछाइयाँ दिखीं—
माँ
पापा
और…
वह खुद।
आईने से आवाज़ आई—
“अब तुम्हारी बारी है…”
अंकित पीछे हटा।
आईने में जो “अंकित” था
वह मुस्कुरा रहा था।
लेकिन उसकी आँखें
खाली थीं।
छलावा अब परफेक्ट था
अब भूत को
रूप बदलने में मेहनत नहीं करनी पड़ती थी।
वह—
-
माँ बनकर
प्यार से सिर सहलाता -
पिता बनकर
कंधे पर हाथ रखता -
और कभी अंकित बनकर
सामने खड़ा हो जाता
और हर बार एक ही बात—
“तुम अकेले क्यों रहना चाहते हो?
हमारे साथ क्यों नहीं?”
असली सच्चाई
अचानक अंकित को
एक पुरानी फाइल मिली
— क्वार्टर की सरकारी रिपोर्ट।
उसमें लिखा था—
“यह कोई एक आत्मा नहीं है।
यह छलावा
उन लोगों से बनता है
जो इस घर में
डर के साथ मरे।”
माँ-पापा मरने के बाद
वह भूत
और ताकतवर हो गया था।
अब उसके पास
तीन चेहरे थे।
सबसे डरावनी रात
रात 3:17 बजे।
लाइट चली गई।
अचानक
अंकित ने सुना—
“बेटा… दरवाज़ा खोलो…”
दरवाज़े के बाहर
उसकी माँ खड़ी थी।
पीछे उसके पापा।
लेकिन तभी
पीछे से किसी ने
उसके कंधे पर हाथ रखा—
और कहा—
“अगर हम बाहर हैं…
तो यह कौन है?”
अंकित ने पीछे देखा।
वह खुद खड़ा था।
छलावे की असली चाल
तीनों एक साथ बोले—
“कोई भी असली नहीं है…
जब तक तुम फैसला न करो।”
घर की दीवारें
धड़कने लगीं।
आईना टूट गया।
और एक ही आवाज़ गूंजती रही—
“यह घर
तुम्हें पूरा करेगा…”
आख़िरी फैसला
अंकित समझ गया—
यह भूत
तभी ताकतवर होता है
जब उसे
पहचान दी जाती है।
उसने ज़ोर से कहा—
“तुम मेरी माँ नहीं हो।
तुम मेरे पिता नहीं हो।
और तुम मैं भी नहीं हो!”
पूरा घर
काँप उठा।
एक तेज़ चीख—
जैसे सौ गले एक साथ टूट गए हों।
सुबह का सन्नाटा
सुबह—
क्वार्टर नंबर 17
पूरी तरह ढह चुका था।
अंदर
कोई लाश नहीं।
कोई अंकित नहीं।
बस दीवार पर
खून से लिखा था—
“छलावा
तब तक ज़िंदा रहता है
जब तक कोई
उसे अपना मानता है।”
अंत… या शुरुआत?
आज भी
अगर आप उस कॉलोनी से गुजरें—
और कोई
आपके अपने की आवाज़ में
आपको बुलाए—
तो मुड़कर मत देखना।
क्योंकि
शायद वह वही हो
जो अंकित को ले गया…

