झूमके वाली रात – Part 3
लेखक: सिद्धार्थ कुमार शर्मा
वेबसाइट: मैं voiceofmemories.in
अब तक…
राहुल चला गया।
अमन भी नहीं बचा।
और झूमका…
अब अकेला नहीं था।
1. तीसरी रात का नियम
गाँव के लोग अब उस सड़क से गुज़रना छोड़ चुके थे। लेकिन डर का एक नियम होता है—
वह वहीं आता है, जहाँ कोई उसे देखने वाला हो।
तीसरी रात, ठीक 2:17 बजे, एक ऑटो चालक विक्रम की गाड़ी उसी सड़क पर खराब हो गई। मोबाइल में नेटवर्क नहीं था। चारों तरफ़ अँधेरा और हवा में अजीब सी ठंडक।
तभी उसे सड़क किनारे कुछ चमकता दिखा।
दो झूमके।
जोड़ी पूरी।
विक्रम ने राहत की साँस ली—
“मतलब अब सब खत्म हो गया…”
उसी पल पीछे से आवाज़ आई—
“नहीं… अब शुरुआत है।”
2. कमला की असली भूख
कमला अब सिर्फ़ आत्मा नहीं थी। वह यादों से बनी चीज़ बन चुकी थी।
राहुल ने उसे चलना सिखाया।
अमन ने उसे आवाज़ दी।
और अब…
उसे शरीर चाहिए था।
पूरी तरह।
विक्रम ने भागने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर ज़मीन से चिपक गए। सामने कमला खड़ी थी—
इस बार साफ़ चेहरा, सूखे आँसू और दोनों कानों में झूमके।
“तुम तीन हो गए,” उसने कहा।
“अब मैं अधूरी नहीं हूँ।”
3. गाँव का आख़िरी सच
उसी रात गाँव के मंदिर में घंटियाँ अपने आप बजने लगीं। पुजारी ने पुरानी पोथी खोली।
उसमें लिखा था—
“जिस आत्मा की मौत लालच और अपमान से हो, वह वस्तु में बँध जाती है।”
“और जब वह वस्तु पूरी हो जाए…”
“तो आत्मा शरीर माँगती है।”
“तीन आत्माएँ, एक देह।”
पुजारी काँप उठा।
4. अंतिम दृश्य
सुबह सड़क पर एक और साइकिल मिली।
इस बार उस पर खून नहीं था।
सिर्फ़ एक चीज़ थी—
तीन परछाइयाँ।
एक औरत की…
और दो नौजवान लड़कों की।
तीनों एक साथ चल रही थीं।
5. आज की रात
आज भी अगर आप उस रास्ते से गुज़रते हैं और किसी औरत को अकेले खड़ा देखते हैं—
जिसके कानों में झूमके चमक रहे हों—
तो रुकिए मत।
क्योंकि अब वह झूमका ढूँढने नहीं निकलती…
वह देह चुनती है।
अंत (लेकिन पूर्ण नहीं)
कहते हैं, कमला अब शहर की सीमाओं से बाहर निकल चुकी है।
कभी बस स्टैंड पर, कभी अस्पताल के बाहर, कभी सुनसान हाईवे पर…
जहाँ कोई थका हुआ नौजवान अकेला मिले।
और ज़मीन पर अगर झूमके की आवाज़ आए—
छन… छन…
तो समझ लीजिए…
कहानी अब आपके पास आ चुकी है।
महत्वपूर्ण सूचना (Terms & Conditions)
यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसका उद्देश्य केवल मनोरंजन और रचनात्मक लेखन है। इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, समुदाय, जाति, धर्म, स्थान या वास्तविक घटना से कोई संबंध नहीं है। यह किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने, डर फैलाने या नकारात्मकता बढ़ाने के लिए नहीं लिखी गई है। यदि कहानी का कोई अंश वास्तविक प्रतीत हो, तो वह मात्र संयोग है।
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