कमला की हत्या की पूरी रात
(झूमके वाली रात – प्रीक्वल)
लेखक: सिद्धार्थ कुमार शर्मा
वेबसाइट: मैं voiceofmemories.in
प्रस्तावना
हर भूत की एक कहानी होती है।
लेकिन हर कहानी बताई नहीं जाती।
कमला की कहानी भी कभी कोई नहीं सुनना चाहता था…
जब तक वह झूमके में साँस लेने नहीं लगी।
1. शादी से एक रात पहले
कमला की शादी तय हो चुकी थी। अगले दिन बारात आने वाली थी। घर में हल्दी की खुशबू थी, माँ की आँखों में सपने और कमला के कानों में नए चाँदी के झूमके।
कमला बार-बार आईने में खुद को देख रही थी।
“कल से ज़िंदगी बदल जाएगी…”
उसे क्या पता था—
उसकी ज़िंदगी नहीं, उसकी मौत तय हो चुकी है।
2. वह रास्ता
शाम ढलते ही कमला को अपनी मौसी के घर जाना पड़ा। रास्ता वही सुनसान सड़क… जहाँ बाद में झूमका मिलने लगा।
हवा अचानक ठंडी हो गई। पेड़ों ने आवाज़ करना शुरू कर दिया।
तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी—
“कमला…”
वह रुकी।
आवाज़ पहचानी हुई थी।
गाँव का ही एक आदमी। आँखों में लालच और चेहरे पर नकली अपनापन।
3. लालच
उस आदमी की नज़र कमला के झूमकों पर थी।
“शादी के हैं ना?” उसने पूछा।
कमला ने सिर हिलाया और आगे बढ़ने लगी। तभी उसका हाथ पकड़ा गया।
कमला चीखी। आवाज़ जंगल में दब गई।
“बस झूमके दे दे…”
एक झूमका ज़ोर से नोचा गया।
खून बहने लगा।
दर्द से ज़्यादा अपमान था।
4. मौत की साँस
कमला ज़मीन पर गिर पड़ी। साँस उखड़ रही थी। उसकी उँगलियाँ मिट्टी में धँस गईं।
दूसरा झूमका खून में फिसलकर सड़क पर गिर गया।
कमला की आँखों से आँसू बह निकले। उसने आख़िरी बार आसमान की तरफ़ देखा।
और फुसफुसाई—
“जो मेरा झूमका उठाएगा…”
“वह मुझे पूरा करेगा…”
“और मेरे साथ जाएगा…”
उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं।
5. पहली रात
उसी रात गाँव में अजीब बातें होने लगीं।
कुत्ते बिना वजह रोने लगे।
आईने टूटने लगे।
और सड़क पर पड़ा झूमका…
हल्का-हल्का हिलने लगा।
जैसे उसमें कुछ जाग चुका हो।
6. झूमके में कैद
कमला की आत्मा पूरी नहीं थी।
एक झूमका उसके साथ दफ़न हो गया।
दूसरा… रास्ते पर रह गया।
उसकी आत्मा दो हिस्सों में बँट गई।
एक क़ब्र में।
एक झूमके में।
और झूमका…
इंतज़ार करने लगा।
7. अंत नहीं, शुरुआत
लोग कहते हैं—
उस रात के बाद उस सड़क पर कोई लड़की दुल्हन बनकर नहीं गुज़री।
और जो भी उस झूमके को उठाता है…
कमला उसकी परछाईं बन जाती है।
क्योंकि कुछ मौतें मरती नहीं…
वे वस्तुओं में जीने लगती हैं।
महत्वपूर्ण सूचना (Terms & Conditions)
यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। इसका उद्देश्य केवल मनोरंजन और रचनात्मक लेखन है। इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, समुदाय, जाति, धर्म, स्थान या वास्तविक घटना से कोई संबंध नहीं है। यह कहानी किसी भी प्रकार से किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने या नकारात्मक भावना फैलाने के लिए नहीं लिखी गई है। यदि कहानी का कोई अंश वास्तविक प्रतीत हो, तो वह मात्र संयोग है।
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लेखक: सिद्धार्थ कुमार शर्मा
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