👻 हॉस्टल की वह आत्मा👻
(कक्षा 4 से कक्षा 12 तक का डरावना सफर)
मैं उस वक्त कक्षा चार में पढ़ता था, जब मुझे पहली बार घर से दूर हॉस्टल में रहना पड़ा। गाँव से निकला एक मासूम बच्चा, जिसे पढ़ाई के सपने तो दिखाए गए थे, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया था कि उस हॉस्टल की रातें कितनी डरावनी होने वाली हैं।
हॉस्टल पुराना था। ऊँची-ऊँची दीवारें, जंग लगे दरवाज़े, और पीछे की तरफ एक पुराना बाथरूम, जहाँ दिन में भी अजीब-सी नमी और सन्नाटा रहता था।
पहली रात की शुरुआत
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| हॉस्टल की वह आत्मा |
पहली रात सब कुछ सामान्य था। लेकिन जैसे ही रात के 12 बजे, अचानक
“छप… छप…”
बाथरूम की तरफ से पानी गिरने जैसी आवाज़ आने लगी।
मैंने सोचा—
“शायद कोई बच्चा होगा।”
लेकिन थोड़ी देर बाद आवाज़ बदल गई।
अब ऐसा लग रहा था जैसे कोई धीमे-धीमे चल रहा हो।
मेरी आँखें खुली रह गईं। पूरा शरीर पसीने से भीग गया।
मैंने चादर ओढ़ ली, लेकिन आवाज़ें बंद नहीं हुईं।
उस रात मैं एक पल भी नहीं सो पाया।
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किताबें बिखरी मिलीं
अगली सुबह कुछ अजीब हुआ।
हॉस्टल के स्टडी रूम में रखी किताबें ज़मीन पर बिखरी पड़ी थीं।
कुछ किताबों के पन्ने फटे हुए थे।
हॉस्टल वार्डन ने कहा—
> “शायद किसी बच्चे ने शरारत की होगी।”
लेकिन हम जानते थे…
कोई बच्चा रात के 2 बजे स्टडी रूम में नहीं जाता।
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आत्मा की चर्चा
धीरे-धीरे हॉस्टल में बातें फैलने लगीं।
सीनियर लड़कों ने बताया—
> “यह हॉस्टल पहले एक छात्रावास नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों के समय का डाक बंगला था।”
“कहते हैं, यहाँ एक लड़के की मौत हो गई थी… बाथरूम में।”
उस दिन के बाद बाथरूम की आवाज़ें और तेज़ हो गईं।
कभी किसी के कान में फुसफुसाहट होती,
कभी किसी की चादर खिंच जाती,
और कभी किसी का नाम लेकर कोई आवाज़ बुलाती—
> “आओ…”
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कक्षा 6–8 : डर का बढ़ता साया
जैसे-जैसे मैं बड़ी कक्षाओं में गया,
डर और साफ दिखने लगा।
एक रात मैंने खुद देखा—
बाथरूम के दरवाज़े के पास
एक परछाईं थी…
जिसके पैर ज़मीन को छू नहीं रहे थे।
उसकी आँखें…
जैसे अंधेरे में चमक रही हों।
मैं डर के मारे चिल्लाना चाहता था,
लेकिन आवाज़ गले में ही अटक गई।
अगली सुबह एक बच्चा बुखार में था।
वह बस यही कह रहा था—
> “वो मेरे पास बैठी थी…
किताबें फेंक रही थी…”
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कक्षा 9–10 : आत्मा का गुस्सा
अब घटनाएँ खतरनाक होने लगी थीं।
रात में लाइट अपने आप बंद हो जाती
बाथरूम का दरवाज़ा ज़ोर से पटकता
किताबें दीवार से टकराकर गिरतीं
एक रात तो हद हो गई।
रात के लगभग 1:30 बजे
पूरा हॉस्टल एक साथ जाग गया।
धड़ाम—धड़ाम—धड़ाम
स्टडी रूम की अलमारी उलट गई थी।
किताबें ऐसे बिखरी थीं
जैसे किसी ने गुस्से में फेंकी हों।
वार्डन भी डर गया।
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कक्षा 12 : सच्चाई का पता
कक्षा 12 में हमें सच्चाई पता चली।
एक पुराने चौकीदार ने बताया—
> “सालों पहले एक छात्र
रात में बाथरूम में गिर गया था।
कोई उसकी आवाज़ नहीं सुन पाया।
सुबह उसकी लाश मिली…”
उसकी आत्मा
आज भी पढ़ने वाले बच्चों से जलती है।
क्योंकि उसे पढ़ाई पूरी करने का मौका नहीं मिला।
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हॉस्टल छोड़ते समय
जब मैंने कक्षा 12 पास की
और हॉस्टल छोड़ने लगा,
तो आख़िरी रात…
बाथरूम से वही आवाज़ आई।
लेकिन इस बार डर नहीं था।
बस एक ठंडा-सा एहसास।
जैसे कोई कह रहा हो—
> “तुम जा रहे हो…
लेकिन मैं यहीं रहूँगी…”
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आज भी…
आज सालों बाद भी
अगर रात में पानी टपकने की आवाज़ आती है
तो मुझे वही हॉस्टल याद आ जाता है।
शायद…
वो आत्मा आज भी
किसी किताब को फाड़ रही होगी…
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📌 डिस्क्लेमर
यह कहानी केवल मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसका उद्देश्य किसी की भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है।
