जंगल के उस हिस्से में शाम जल्दी उतर आती थी।
जंगल के उस हिस्से में शाम जल्दी उतर आती थी। सूरज पहाड़ियों के पीछे छिपता तो ऐसा लगता, जैसे किसी ने रोशनी का स्विच अचानक बंद कर दिया हो। पेड़ों के बीच से बहती हवा में अजीब सी नमी थी, और हर पत्ता जैसे किसी पुराने रहस्य को अपने भीतर छुपाए खड़खड़ाता रहता था। इसी जंगल के बीच एक पुराना स्कूल था—टूटी खिड़कियाँ, झुकी हुई छत, और जंग लगे लोहे का फाटक, जिस पर अब भी फीका-सा नाम लिखा था। लोग उसे बस “बंद स्कूल” कहते थे।
गाँव के बुज़ुर्ग बताते थे कि यह स्कूल कभी बहुत रौनक वाला हुआ करता था। सुबह की घंटी बजते ही बच्चों की हँसी जंगल तक गूँजती थी। मास्टरनी सविता बच्चों को पढ़ाती थीं—नरम आवाज़, सख़्त अनुशासन और आँखों में अजीब-सी ममता। लेकिन फिर एक दिन सब कुछ बदल गया। बारिश की वह शाम, जब बादल इतने घने थे कि आसमान नीचे उतर आया हो, उसी शाम स्कूल के भीतर कुछ ऐसा हुआ कि उसके बाद किसी ने उस जगह को पहले जैसा नहीं देखा।
उस दिन स्कूल में देर तक रुकने वाले बच्चे थे। गाँव तक जाने वाला रास्ता कीचड़ से भर गया था, इसलिए सविता ने बच्चों को रुकने को कहा। बाहर बारिश तेज़ हो गई। बिजली चमकी, और फिर एक तेज़ आवाज़—जैसे धरती ने कराह ली हो। उसके बाद क्या हुआ, यह किसी को ठीक-ठीक नहीं पता। बस इतना कहा जाता है कि अगली सुबह स्कूल का फाटक अंदर से बंद मिला, और भीतर… भीतर सन्नाटा था। न बच्चे, न सविता। दीवार पर चॉक से लिखा एक वाक्य था—“हम यहीं हैं।”
साल बीते, सरकार ने स्कूल बंद कर दिया। रिकॉर्ड में कारण कुछ और लिखा गया, पर गाँव वालों की यादों में डर बस गया। रात के समय वहाँ से कभी घंटी बजने की आवाज़ आती, कभी किसी के पढ़ने की। जंगल से लौटते लकड़हारे बताते कि उन्होंने खिड़की के भीतर परछाइयाँ देखीं—छोटी-छोटी, जैसे बच्चे बेंच पर बैठे हों।
इन्हीं कहानियों ने आर्यन, मोहित और सौरव को वहाँ खींच लाया। तीनों शहर से थे, और पुरानी जगहों पर जाकर लिखना उनका शौक़ था। उन्होंने सोचा, एक रात वहाँ बिताकर कहानी लिखेंगे। शाम ढलते ही वे स्कूल पहुँचे। फाटक चरमराया, मानो किसी ने गहरी नींद से जगाया हो। भीतर कदम रखते ही हवा ठंडी हो गई। दीवारों पर पुराने चार्ट लटक रहे थे, और फर्श पर धूल की मोटी परत थी, जिसमें उनके पैरों के निशान साफ़ दिख रहे थे।
पहला घंटा शांति में बीता। वे एक कमरे में बैठे बातें करते रहे। रात गहराई तो जंगल की आवाज़ें तेज़ हो गईं—झींगुर, दूर कहीं उल्लू की पुकार। अचानक कहीं से घंटी की टन-टन सुनाई दी। तीनों चौंक गए। यह आवाज़ उसी दिशा से आई, जहाँ बरसों से बिजली नहीं थी। मोहित हँसने की कोशिश करते हुए बोला कि शायद हवा से कुछ टकरा गया होगा, पर उसकी आवाज़ में भरोसा नहीं था।
वे उस कमरे की ओर बढ़े, जहाँ से आवाज़ आई थी। ब्लैकबोर्ड के सामने पुरानी डेस्क लगी थीं। जैसे ही उन्होंने कदम रखा, बोर्ड पर अपने-आप चॉक चलने की आवाज़ आई। सफ़ेद लकीर उभरी—धीरे, साफ़ अक्षरों में। लिखा था, “बैठ जाओ।” सौरव का दिल तेज़ धड़कने लगा। उसने पीछे मुड़कर देखा—दरवाज़ा अपने-आप बंद हो चुका था।
कॉरिडोर में हल्की-सी परछाईं फिसली। साड़ी का पल्लू जैसे हवा में लहरा गया हो। एक शांत आवाज़ गूँजी—“क्लास शुरू हो चुकी है।” वह आवाज़ सविता जैसी थी, वैसी ही नरम, लेकिन उसमें अजीब-सी थकान थी। बेंचें धीरे-धीरे खिसकने लगीं, मानो अदृश्य हाथ उन्हें अपनी जगह पर ला रहे हों। दीवार पर टंगे घड़ी के काँटे बारह पर टिक गए।
आर्यन ने मोबाइल निकाला, पर स्क्रीन काली हो गई। तभी फर्श पर छोटे-छोटे कदमों की आवाज़ आई। उन्हें महसूस हुआ, जैसे कोई उनके आसपास घूम रहा हो—हँसी नहीं, रोना नहीं, बस मौजूदगी। बोर्ड पर नया वाक्य उभरा—“आज भी पढ़ाई होगी।”
डर और जिज्ञासा के बीच सौरव ने अलमारी खोली। भीतर पुराने रजिस्टर थे। उसने एक रजिस्टर पलटा—उसी दिन की तारीख़। नाम लिखे थे, और आख़िरी पन्ने पर लाल स्याही से एक नोट—“गैस लीक। बच्चों को बाहर निकालो।” नीचे सविता के हस्ताक्षर थे। सच सामने था। उस रात स्कूल के पीछे लगे पुराने सिलिंडर से ज़हरीली गैस फैली थी। सविता ने बच्चों को बचाने की कोशिश की, पर दरवाज़े जाम हो गए। मदद देर से पहुँची।
जैसे ही सौरव ने रजिस्टर बंद किया, हवा भारी हो गई। परछाईं साफ़ होने लगी। सविता सामने थीं—चेहरा शांत, आँखों में दर्द नहीं, बस इंतज़ार। उन्होंने कहा, “सच बताओगे?” आर्यन ने सिर हिलाया। दरवाज़ा खुला। बाहर सुबह की हल्की रोशनी फैल रही थी।
गाँव वालों ने दो युवकों को बाहर बेहोश पाया। तीसरा—आर्यन—कभी नहीं मिला। कहते हैं, उस दिन के बाद स्कूल से आवाज़ें कम हो गईं। पर कभी-कभी, जब जंगल में बादल घिरते हैं, ब्लैकबोर्ड पर एक नया वाक्य उभरता है—“आज छुट्टी है।”
